Thursday, 12 March 2015

भूमि अधिग्रहण बील के विरोध में किसान संघटित हो कर आंदोलन करें...

किसान विरोधी भूमी अधिग्रहण बील सरकार ने वापस लेने के लिए 
लाखो किसान संघटीत हो कर आंदोलन करें।

नरेंद्र मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को ला कर देश के किसानों पर घोर अन्याय किया है। इस कारण देश में चारों तरफ से आवाज़ें उठीं, इल्ज़ाम लग गये कि सरकार किसान विरोधी है। जगह-जगह किसान सडक पर उतरने लगे। शायद उसी वजह से नरेंद्र मोदी जी को कहना पडा कियदिइस बिल के कारण  किसानों पर सरकार की तरफ से अन्याय होता है तो हमें किसानों की भलाई के सुझाव दिये जाएं, हम जरूर विचार करेंगे। सरकार की भूमिका का स्वागत करते हुए आंदोलन की तरफ से कुछ मुद्दे सरकार के विचारार्थ प्रस्तुत करते हैं..
1)  सरकार यदि किसानों की भलाई की सोच रखती है तो, आज़ादी के बाद देश में ज़मीन का सर्वे (लैण्ड-मॅपींग) होना ज़रूरी है। ज़मीन के क्लास 1/2/3/4/5/6 ग्रेड बनाकर क्लास 1/2/3 ग्रेड की ज़मीनें जो उपजाऊ हैं, ऐसी ज़मीन औद्योगिक क्षेत्र के लिए संपादित नहीं की जायेगी, ऐसा कानून बनाना ज़रूरी है। लेकिन ऐसा कानून नहीं बना। बिल में कहा गया है कि, जहॉं साल में दो-तीन फसल उगती हैं ऐसी ज़मीन का भी अधिग्रहण किया जायेगा। यह तो उन किसानों के प्रति सर-असर ना-इन्सा़फी है। पानी मिल जाने के कारण जिस ज़मीन में अनाज की पैदावार बढ रही है, ऐसी ज़मीन का भू-संपादन नहीं होना चाहिए।
2)  आज़ादी के 68 साल के बाद भी किसानों को आत्महत्या करनी पड रही हैं, क्यों कि खेती की पैदावार में लागत ज़्यादा आती है और उपज के दाम कम मिलते हैं। हर फसल पर लागत खर्च के आधार पर मूल्य निर्धारण होना ज़रूरी है। इसमें मुश्किल क्या है? देश की कोई भी यूनीवर्सिटी इस काम को करने में सक्षम है। खेती की पैदावार में आमदनी कम और खर्चा ज़्यादा होने के कारण बार बार कर्ज़ लेने को किसान को बाध्य होना पडता है। कर्ज़ गिरफ्त में से छुटकारा पाने की कोई सम्भावना नहीं दिखती है। आख़िर कार नैराश्य भावना से ग्रस्त हो कर किसान आत्महत्या करने पर मजबूर होता है।
3)  केंद्र सरकार और हर राज्य की सरकार कृषि आयोग स्थापित करें। ये आयोग किसानों की भलाई और उन्नति के लिए व कृषि उत्पादन बढाने हेतु काम करें।
4)  नदी किनारे की ज़मीन अत्यन्त उपजाऊ होती है। उसमें से अच्छी मात्रा में कृषि उपज मिलती है। ऐसी ज़मीन का अधिग्रहण कर उसे उद्यम क्षेत्र के लिए उपलब्ध कराना ठीक नहीं है। ऐसा करने से उपजाऊ क्षेत्र का, पवित्र नदियों के पानी को प्रदूषित करने वाले क्षेत्र में परिवर्तन हो जाता है। एक तरफ गंगा सफाई का कार्य शुरु किया है। दुसरी तरफ नदीयों का पानी गंदा करना ठिक नही है।
5)  भू-संपादन करने के बजाए ग्रामसभा को विश्वास में ले कर किसानों की ज़मीन को सरकार ने लीज़ पर लेनी चाहिए। जिन किसानों की ज़मीन लीज़ पर ली जाएगी, उन किसानों को उस प्रकल्प में साझेदारी मिले ता कि किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो, उन्हें आत्महत्या करने की नौबत ना आये।
6)  न्यायिक व्यवस्था में बदलाव लाना ज़रूरी है। आज सालो-साल निकल जाते हैं पर इन्सा़फ नहीं मिलता है। ऐसे में सरकार कहती है कि किसान को अन्याय के विरोध में न्यायालय में जाना हो तो सरकार की अनुमति लेनी पडेगी। भूमि अधिग्रहण बिल में किसानों के न्यायालय में गुहार लगाने पर पाबंदी लायी गई है। यह क़दम जनतंत्र के विरोधी है।
7)  देश में बेरोजगारी की समस्या के समाधान में विदेश की कंपनियों को यहॉं बुला कर सिर्फ औद्योगिक क्षेत्र का विकास करना, यही एक मात्र पर्याय बचा नहीं है। हर गांव को एक इकाई मान कर कृषि पैदावार को बढावा दें तथा कृषि आधारित उद्योगों की योजनाओं को प्राथमिकता दी जाएं, ता कि गांव के गांव में ही हर हाथ को काम मिले, गांव के युवकों को शहर की ओर ना जाना पडे।
8)  आज हमारे देश में औद्योगिक क्षेत्र तेज़ी से बढ रहा है, विदेशी कंपनियां आ रही हैं। पेट्रोल, डीज़ल, रॉकेल, कोयला जैसे इंधन जलाए जा रहे हैं। उनके जलने के साथ देश में प्रदूषण भी बढता जा रहा है। उसके कारण प्रकृति में अघटित घटनाएं घट रही हैं। लोगों की बीमारियां बढ रही हैं। अस्पताल जितने भी बने, कम ही पडते जा रहे हैं। इसी लिए महात्मा गांधीजी कहते थे  विकास ऐसा करो कि प्रकृति और मानवता का शोषण ना हो। शोषण के बल पर हुआ विकास शाश्वत विकास नहीं हो सकता। ऐसे विकास सेकभी ना कभी विनाश ही होगा। इंधन जलाने के कारण प्रदूषण बढने के साथ-साथ तापमान भी बढ रहा है। यह बहुत बडा खतरा है।
9)  आदरणीय नरेंद्र मोदी जी ने गुजरात में जन्म लिया, गुजरात मेंेंं छोटे से बडे हुए। चाय बेचने वाले से प्रधान मंत्री तक का सफर तय किया। फिर ये समझ नहीं आता कि गांधी जी की इन बातों को वे क्यों नहीं समझ पा रहे? कृषि पैदावार के बढने से युवाओं को और जनता को गांव के गांव में रोज़गार मिल सकता है। प्रदूषण की रोकथाम हो कर प्रकृति का सन्तुलन बनाये रखने में मदद होगी। हम ऐसा केवल बोलते ही नहीं हैं, हम लोगों ने इसे कर भी दिखाया है।
10)  महात्मा गांधीजी कहते थे कि स्मार्ट- स्वयंपूर्ण विलेज बनाओ और सरकार कहती है स्मार्ट सिटी बनानी है। स्मार्ट विलेज बनायेंगे तो प्रकृति और मानवता का शोषण नहीं होगा।
  
महात्मा गांधीजी के विचारों के मुताबिक गाव को मुख्य प्रशासनिक इकाई मानकर ग्रामसभा को विधायिका का अधिकार देना ज़रूरी है। क्यों कि ग्रामसभा तो स्वयंभू और सार्वभौम है। ग्रामसभा लोकसभा और विधानसभा को हर पांच साल में बदलती रहती है। लेकिन ग्रामसभा खुदकभी बदलती नहीं। हर व्यक्ति 18 साल की उमर होने पर ग्रामसभा सदस्य बनता है, और ताउम्र ग्रामसभा का सदस्य बना रहता है। ग्रामसभा को चुना नहीं जाता, वह स्वयंभू है। इस लिए गांव की जल, जंगल, जमीन, पानी जो भी, जितनी भी साधनसंपत्ति है उसका मालिक तो गांव ही है। इसलिए भारत सरकार या राज्य सरकार को गांव की कोई भी साधनसंपत्ति यदि लेनी हो तो उसमें ग्रामसभा की संमति होना ज़रूरी है। ऐसा कानून बनना चाहिये। इसी से सही लोकतंत्र संस्थापित होगा। मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण बील ला कर ग्रामसभा के अधिकार को ही खत्म कर दिया है। यह लोकतंत्र के विरोधी है।
कृषिप्रधान भारत देश में किसानों की भलाई की सोच रखने के बजाए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को ला कर सरकार किसानों पर अन्याय कर रही है। और पुंजी पतीयों की भलाई सोच रही है। लोगों का लोगोें ने लोक सहभाग से चलाया हुआ तंत्र होता है लोकतंत्र। भूमि अधिग्रहण बिल लोगों का अधिकार छीनकर लोकतंत्र का गला घोंटने वाला बिल है।
किसी भी नीजी कंपनी हो या नीजी संस्था हो उनके लिए किसानों की जमीन अधिग्रहण करनी है तो, लोकतंत्र के मुताबीक जब तक किसानो की सम्मती नही है तब तक जमीन अधिग्रहण नही होना चाहिए।
भूमि अधिग्रहण का सन्‌ 1894 का अंग्रेज़ों का बनाया कानून अन्याय मूलक था। इस लिए सन्‌ 2013 में संसद की सभी पार्टियोंे की सहमति से सर्वसम्मत कानून बनाया गया था। भाजपा उस वक्त विपक्ष नेता की भूमिका निभा रही थी। उस वक्त किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया था। अब नरेंद्र मोदी सरकार को किस बात की जल्द बाज़ी आन पडी कि अध्यादेश निकालना ज़रूरी हो गया
? अध्यादेश का रूपांतरण बिल में किया गया और बिल से कानून बनाने की जल्दबाजी हो रही है। लोकपाल, लोकआयुक्त जैसे जनता के भलाई का, भ्रष्टाचार को रोकनेवाला कानून उस पर अंमल करना जरुरी नही लगता जीतना भूमी अधिग्रहण बील की जल्दी हो रही है।
कानून में बदलाव लाना ज़रूरी था तो फिर से संसद में बहस कर के सर्व सम्मति से बदलाव ले आते। विगत कई सालों में कई राज्यों में कई सारे प्रकल्प बने हैं। उनके लिए किसानों की लाखों हेक्टर ज़मीन अधिग्रहण की गई है। लेकिन उनमें की कई ज़मीनों पर ना तो उद्योग शुरु हुआ है, ना ही वह ज़मीन किसानों को लौटाई गई। देश में लाखों हेक्टर ज़मीन यूं ही बेकार पडी है। देश भर की ऐसी सभी ज़मीनों की जांच कर जिन ज़मीनों पर ज़मीन लेने के पांच साल बाद तक प्रकल्प शुरु नहीं हुआ हो ऐसी ज़मीनें किसानों को लौटा देनी चाहिए।
कई जगहों पर ऐसा भी हुआ है कि किसी प्रकल्प के लिए किसानों की ज़मीन तो अधिग्रहण की गई है लेकिन 25/30/35 साल से किसानों को पुरा मुआवजा तक नहीं मिला और ना ही उनका पुनर्वास भी तो हुआ है। इस बात की अनदेखी सरकार क्यों कर रही है? कई किसान ऐसे हैं कि जिनकी ज़मीन अधिग्रहण हुई, मकान चले गए लेकिन मुआवजा और पुनर्वास नहीं हुआ है। उन किसानों के दर्द को सरकार ने समझना ज़रूरी है। इन 68 वर्षों में सरकारों की संवेदन शीलता ही खत्म हुई जा रही है। यह बात मानवता के लिए कलंक है।
भूमि अधिग्रहण बिल लोकसभा में तो पारित हो गया, अब देखना है कि राज्य सभा में क्या होने जा रहा है। राज्य सभा में भी यदि वह पारित हो जाता है तो देश की जनता को सोचना पडेगा और दिखाना पडेगा कि सबसे ऊंचा स्थान जनसंसद का है। आझादी की दुसरी लढाई समझकर अहिंसा मार्ग से देश में आंदोलन करना होगा।

भवदीय,

कि. बा. तथा अण्णा हजारे

Monday, 2 March 2015

भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में वर्धा के सेवाग्राम से दिल्ली पदयात्रा और रामलीला मैदान पर जेल भरो आन्दोलन

भूमि अधिग्रहण पुनर्वास व पुनर्व्यवस्थापन में उचित मुआवजा तथा पारदर्शिता कानून 2013 (संक्षेप में भूमि अधिग्रहण कानून-2013) यह बिल सन्‌ 2013 में संसद में रखा गया जब कॉंग्रेस सरकार सत्तासीन थी और भाजपा विपक्ष में थी। सत्ताधारी और विपक्ष दोनों ने सहमति से तब उसे पारित किया था। उस व़क्त भाजपा ने उसका विरोध नहीं किया था। संसद में तब पारित बिल में जो प्रावधान थे तथा नरेन्द्र मोदी सरकार नये अध्यादेश के तहत क्या तबदीलियॉं लाना चाहती है यह इस तालिका से स्पष्ट होता है।

अ.क्र.
2013 का कानून
नया अध्यादेश
1
किसानों की ज़मीन को उद्यम क्षेत्र के लिए अधिग्रहित करने के लिए 80 फीसदी जनता की सहमति अनिवार्य। लोगों ने, लोगों के लिए, लोकसहभागिता से चलायी हुई राज्य प्रणाली यानि लोकशाही। इसी कारण से इस कानून में 80 फीसदी लोकसहभागिता अपना महत्व रखती है।
80 फीसदी सहमति को सरकार ज़रूरी नहीं मानती। अपनी मन मर्ज़ी के मुताबिक किसानों की ज़मीन को ले कर सरकार उद्यमियों को दे देंगी। यह संकेत करता है कि अब लोकशाही का गला घोंट कर अंग्रेज़ों से भी भयकारी तानाशाही लाने का ज़माना शुरु होने जा रहा है। जिन की ज़मीन है उन किसानों की सम्मति न लेना जनतन्त्र के विरोधी है।
2
जिस ज़मीन में सालाना दो या तीन फसलें ले कर राष्ट्र के अन्न उत्पादन में वृद्धि की जाती है, ऐसी ज़मीन (सिंचित ज़मीन) का उद्यम क्षेत्र के लिए अधिग्रहण नहीं किया जाएगा।       
इस प्रावधान को हटा कर अब ऊपजाऊ सिंचित भूमि भी उद्यम क्षेत्र के लिए मुहैया कराने का प्रावधान इस अध्यादेश में किया जा रहा है। कृषि प्रधान भारत देश में इस प्रकार से अपनी ख़ुद की ऊपजाऊ भूमि को गँवा बैठना किसानों के प्रति बडी ही नाइन्सा़फी है।
3
किसानों से अधिग्रहित भूमि उद्यमियों द्वारा यदि 5 वर्ष तक उपयोग में नहीं लाई गई तो 5 वर्ष के पश्चात्‌ किसान को लौटाई जाएगी।       
नये अध्यादेश में 5 वर्ष का बन्धन हटा दिया गया है। अधिग्रहित ज़मीन अब नहीं लौटाई जाएगी। उद्यम प्रकल्प खडा होने तक ज़मीन सरकार के या उद्यमियों के क़ब्ज़े में रहेगी, चाहे जितना समय लगे, कोई समय सीमा नहीं है।
4
यदि किसान की ज़मीन सरकार द्वारा ज़बरन्‌ अधिग्रहित की गई हो तो इन्सा़फ की गुहार लगाने हेतु इस कानून के मुताबिक किसान न्यायपालिका में फरियाद कर सकता था।       
किसान की ज़मीन उद्यम क्षेत्र के लिए ज़बरन्‌ अधिग्रहित की गई हो तो सम्बन्धित अ़फसर के ख़िला़फ न्यायपालिका में मुक़दमा करने के लिए सरकार की पूर्व सम्मति लेनी पडेगी। इन्सा़फ मॉंगने हेतु न्यायपालिका जाने का रास्ता बन्द करने का सा़फ मतलब है अंग्रेज़ों से भी भयकारी तानाशाही का आना। फर्क़ ही क्या रहा अंग्रेज़ों की तानाशाही में और इस सरकार में?
5
यह प्रावधान रखा गया था कि किसानों की भूमि का अधिग्रहण करने के पूर्व जन सुनवाई कराई जाए ता कि सामाजिक प्रभाव का आकलन हो पाए।       
उद्यम क्षेत्र के लिए किसानों की भूमि अधिग्रहण के लिए पूर्व जन सुनवाई अब ग़ैरज़रूरी। अब सरकार उसे आवश्यक नहीं मानती। जनतन्त्र का गला घोंट देने वाला तरीक़ा है यह।
6
निजि स्कूल, शिक्षा संस्थान, निजि अस्पताल या बेघरों के लिए घर बनाने हेतु किसानों की ज़मीन देने का प्रावधान नहीं था।       
निजि स्कूल, शिक्षा संस्थान, निजि अस्पताल या बेघरों के लिए घर बनाना, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे आकर्षक शीर्षकों के नाम पर किसानों की ज़मीनें ले कर निजि संस्थानों को सौंपने का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है। कानून का सहारा ले कर किसानों की भूमि पर ज़बरन्‌ क़ब्ज़ा कर, कहीं अपने नजदीकी कार्यकर्ताओं या उद्यमियों को उपलब्ध कराने की चाल तो इन सबके पीछे नहीं है? इस अध्यादेश के कारण भू मा़िफयाओं के द्वारा किसानों पर ज़ुल्म और अत्याचार बढने की सम्भावना है जो कि मुम्बई जैसे कई शहरों में होते रहे हैं।

सत्तासीन होने के पूर्व नरेन्द्र मोदी जी समय समय पर गुहार लगाते रहे कि जन सहभागिता के बग़ैर सच्चा लोकतन्त्र सम्भव नहीं है। लेकिन भूमि अधिग्रहण के बारे में जन सहभागिता, लोक सम्मति को ग़ैर ज़रूरी क़रार दे कर अपनी मर्ज़ी से किसानों की ज़मीनें लेने पर सरकार आमादा है। किसानों के विरोध में अध्यादेश निकाल कर किसानों के प्रति नाइन्सा़फी कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी जी की कथनी और करनी में बडा ही फर्क़ आने लगा है।
      इस नाइन्सा़फी के ख़िला़फ दिल्ली में जन्तर मन्तर और संसद भवन मार्ग पर देश के विभिन्न राज्यों के किसान एवं उनके संगठनों ने 23, 2425 फरवरी 2015 को व्यापक प्रदर्शन किए। नरेन्द्र मोदी जी की सरकार को जनता को आश्वासित करना पडा कि यदि अध्यादेश में किसानों पर अन्याय हो रहा हो तो हम उसे बदलेंगे और अब अध्यादेश के एवज में मोदी सरकार ने नया बिल बनाया है। मगर इस नये बिल को देखने पर पता चलता है कि पूर्व प्रस्तावित अध्यादेश में और इस बिल में कुछ फर्क़ ही नहीं है। बस नया बिल ले आए और जनता को भ्रमित कर दिया।
      स्वाधीन भारत के 68 वर्ष पूरे होने पर भी कृषि ऊपज को उत्पादन व्यय के अनुपात में उचित दाम न मिलने के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं। इस प्रस्तावित बिल का यदि कानून बनता है तो किसानों की आत्महत्याएं बढने की ही सम्भावना है। साथ ही इस देश के किसान और सरकार के बीच संघर्ष पनपने की भी सम्भावना है। इसी लिए सरकार के लिए ज़रूरी बनता है कि सामंजस्य का अवलम्ब करे व इस बिल में किसान के प्रति नाइसा़फी ना हो ऐसा निर्णय करे।
      बारम्बार श्री मोदी जी कहते आए हैं कि बिना लोक सहभागिता के सच्चा लोकतन्त्र सम्भव नहीं है। तो फिर इसके लिए ग्राम सभा को ज़्यादा अधिकार दिलाने वाला कानून बनना ज़रूरी है। लेकिन इसके लिए मोदी जी की सरकार राज़ी नहीं है। गॉंव के जल, जंगल, ज़मीन, पानी इन संसाधनों पर गॉंव का अधिकार है। गॉंव की कोई भी चीज़ भारत सरकार या राज्य सरकार को लेनी हो तो बिना ग्राम सभा की इजाज़त से नहीं ली जा सकती ऐसे कानून का बनना ज़रूरी है। यदि ऐसा कानून बन पाया तो तभी लोकतन्त्र पनपेगा।
स्वाधीनता के 68 वर्षों में देश की ज़मीन का सर्वेक्षण तक नहीं हो पाया। सर्वेक्षण करा कर भूमि की 1/2/3/4/5/6 श्रेणियॉं बनाई जायें। फिर कानून बनें कि केवल श्रेणी 4/5/6 की भूमि ही अधिग्रहित की जा सकती है। श्रेणी 1/2/3 की ज़मीन उद्यम के लिए अधिग्रहित नहीं होगी। यदि ऐसा प्रावधान बने तो भूमि अधिग्रहण के मसअले को सुलझाया जा सकता है। लेकिन उद्योजक और सरकार तो शहरों की आस पास वाली ज़मीनों पर नज़र लगाए बैठी हैं।
कृषि प्रधान भारत देश में किसानों के हित को प्रधानता देना ज़रूरी है। उद्यमियों को यदि ज़मीन देनी है तो क्यों न किराये पर दी जाए? उस ज़मीन पर जो उद्यम शुरु होंगे क्यों न उनमें किसानों को भी शामिल करें या साझेदारी दें ता कि उनकी आमदनी बढे और वह आत्महत्या करने को मजबूर न हो? इससे सामाजिक, आर्थिक विषमता नहीं बढेगी, जिस ओर हमारा संविधान संकेत करता है। हालॉं कि आज गरीब और गरीब होते जा रहे हैं और अमीर और अधिक सम्पन्न।
किसानों पर नाइन्सा़फी का कहर ढाने वाले इस बिल के विषय में लोकशिक्षण व जनजागरण करने तथा इस बिल का विरोध करने के मक़सद से कुछ किसान संगठनों से मशविरा करने पर यह निश्चित हुआ है कि गांधी आश्रम, सेवाग्राम, वर्धा से ले कर दिल्ली तक पदयात्रा का आयोजन किया जाए। सरकार के किसान विरोधी रवैये के बारे में स्थान स्थान पर लोकशिक्षा व जन जागरण करती यह पदयात्रा करीब ढाई- तीन महीने में दिल्ली पहुंचेगी। दिल्ली पहुंचने पर रामलीला मैदान में जेल भरो आन्दोलन करने का इरादा है। सेवाग्राम में 9 मार्च 2015 में बैठक के बाद में पदयात्रा की आन्दोलन की तारीखें निश्चित की जाएंगी।
      पूरे देश भर के किसानों से अपील है कि दिल्ली के रामलीला मैदान में जब जेल भरो आन्दोलन होगा तब देश के सभी किसान अपने अपने गॉंव, तहसील, ज़िला और राज्य में जेल भरो आन्दोलन करें। यह आन्दोलन अहिंसा व शान्तिपूर्ण तरीक़े से करना है।
      यह आन्दोलन स्वाधीनता की लडाई का ही दूसरा चरण होगा, इस लिए आन्दोलन में किसान, किसान संगठन और जनता का बडे पैमाने पर उतर आना आवश्यक है। सेवा ग्राम से ले कर दिल्ली तक की यात्रा में विभिन्न ज़िम्मेदारियॉं निभाने हेतु देश के विभिन्न किसान संगठन, स्वयं सेवी संस्थान, युवा मण्डल व कार्यकर्ता-स्वयंसेवकों को आगे आना होगा। दिन में आहार व्यवस्था, रात्रि विश्राम आदि का अनुशासित व्यवस्थापन करने वाले कार्यकर्ता गण लगेंगे। पदयात्रा के दौरान देश भर से जुडे संगठन, संस्थान, और सम्बन्धितों से पत्राचार, ईमेल, फोन सम्पर्क की ज़िम्मेदारी निभाने वाले कार्यकर्ताओं की भी आवश्यकता पडेगी। पदयात्रा के तीन माह के कार्य काल में पूरा समय देने वाले आईटी का ज्ञान रखने वाले कार्यकर्ता भी चाहिए। कार्यकर्ताओं के बिछौने व अन्य ज़रूरी सामान ढोने के लिए ट्रक तथा कुछ छोटे बडे वाहन भी लगेंगे। राष्ट्र हित के इस काम में जिससे जो भी बन पाए वह सहयोग अवश्य करें यही अनुरोध है।
सधन्यवाद

भवदीय,

कि. बा. तथा अण्णा हजारे

कार्यकर्ता गण कृपा कर निम्न पते पर सम्पर्क करें :-
भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन न्यास,
मु.पो. राळेगण सिद्धी, ता. पारनेर,
जि. अहमदनगर 414302, फोन.नं. 02488-240401
ईमेल- annahazareoffice@gmail.com
वेबसाईट-www.joinannahazare.org.in, www.annahazare.org

Foot March from Vardha to Delhi against the anti-farmer Land Acquisition Ordinance

The Central Government had tabled the Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 (also known as Land Acquisition Act of 2013) to bring in transparency in land acquisition procedure and to ensure that adequate compensation is paid for acquired lands. The Congress led UPA government was in power in the center and the Bharatiya Janata Party was in the opposition when both ruling and the opposition parties passed the bill unanimously in 2013. Then the BJP did not oppose the bill. The provisions that were in bill when it was passed and the changes that Narendra Modi’s new government made in it by issuing an ordinance will become clear from the following chart:
Sr. No
The Act of 2013
New Ordinance
1.
The Government cannot acquire land for industrial purpose if a minimum 80 % of the farmers do not give consent to it. Democracy means the government of the people, by the people and for the people. Therefore, provision in the bill to ensure participation of 80% people was important.
The ordinance does not make it mandatory for the government to acquire consent of 80 % people. It can acquire lands of farmers as it wishes and allot them to industrialists. This shows how attempts have begun to kill the democracy and bring in dictatorship worse than that of the British. Not taking consent of the farmers who own the land is anti-democratic.
2.
Lands where farmers cultivate 2-3 crops a year (irrigated lands), increase national produce, will not be acquired for industrial purpose.
This provision has been deleted and the ordinance makes provision to acquire even irrigated lands for industrial purpose. This is unjust to the farmers. In an agrarian country like India, giving irrigated land to industry is grave injustice to farmers.
3.
If the industries fail to use the acquired lands within five years, the land would be returned to the farmers.
As per provisions of the ordinance, acquired land will not be returned to farmers. The land will remain in possession of the industrialists or government till the industrial project is completed. There is no condition of completing project in five years.
4.
If the government acquires land of farmers by force and if the farmer wishes to approach the court against the injustice, the bill allowed him to move the court.
If the government acquires land of farmers for industrial purpose by force and if the farmers wish to move the court, they will have to seek approval of the government. Shutting the doors of the courts for people wanting justice is dictatorship worse than that of the British. What is the difference between the dictatorship of the British and the government?
5.
There was provision of holding ‘Jan Sunwai’ (Public Hearings) while acquiring lands of farmers to gauge social reaction.
The provision of holding ‘Jan Sunwai’ (Public Hearings) in accordance with democratic process while acquiring lands of farmers was deleted.  The government says Jan Sunwai is not required. This is anti-democratic.
6.
There was no provision to acquire land for building private schools or for educational institutes or to develop housing projects for homeless.
Plans are afoot to take away lands of farmers in the name of schools, educational institutes, housing for homeless and give them to private parties. This clearly shows that this is aimed at grabbing lands of farmers using the law and provide them to supporters and industrialists in good books of the government. Possibility of injustice against farmers from land mafia increasing due to this cannot be ruled out. This is already happening in several cities of India including Mumbai and Pune.

Narendra Modiji kept on giving assurances from time to time till he came to power. There can be no democracy without people’s participation. However, under the Land Acquisition Bill, the government is going to take away farmers’ lands in absence of the participation or consent of the people. The anti-farmer ordinance is grave injustice against farmers. Narendra Modiji does not walk his talk.
Farmers Organizations and farmers from various states all over the state staged massive agitations against this injustice at Jantar Mantar and Parliament Street (Sansad Bhavan Marg) in Delhi on February 23, February 24 and February 25, 2015. Because of that, Narendra Modi’s government promised to the people that if the ordinance is anti-farmers, it will be amended. Now the Modi Government has prepared a new bill to replace the Ordinance.  However, there is no difference in the Ordinance and the new proposed bill.
The farmers are forced to commit suicide because although 68 years have passed since the country attained the independence, the agricultural produce is not being provided rates based on the expenditure made. If the proposed bill is converted into the law, the possibility of farmers suicide increasing cannot be ruled out. Besides, it may intensify the conflict between the government and the farmers. Therefore, the government must adopt cordial approach and take decisions needed to ensure that the bill is not unjust to the farmers.
Narendra Modiji has reiterated on several occasions that there would be no true democracy without participation of the people. Therefore passing a law giving more powers to the Gram Sabhas is required. However, Modi government is not willing to think on these lines. The village owns the water, forest, land and other natural resources in it. Democracy will prevail in true sense only if a law is made to ensure that the Central or State Government will not be able to acquire any resource from the village without obtaining the consent of the Gram Sabha.
Though 68 years have passed after India attainted freedom, no land survey has been made in the country. Acquiring lands without any opposition would become easier if such a survey is made, lands are classified in class I, II, III, IV, V and VI and law is passed to ensure that only Class IV/V/VI lands can be acquired and Class I/II/III lands cannot be acquired for industrial purpose. However, the industrialists and the government are eyeing lands in vicinities of cities.
In an agrarian country like India, the government must consider the interest of farmers. Why does it not allot the land it provides to industrialists among farmers on lease? Similarly, there must be participation of farmers in industries to be set up on acquired lands so that the financial condition of farmers would improve and they would not be driven to suicides. Besides, such measures would help achieve the principles of social and economic equality in the constitution. Today the poor are becoming poorer and rich are becoming richer.
Some of the farmers’ organizations have met and discussed measures to be taken to spread public awareness against the new bill, which is unjust to farmers, and to protest against it. The decision of taking out a foot march from Sevagram (Gandhi Ashram) at Vardha to Delhi. The foot march will go on for a period of two and a half months to three months. When it reaches Delhi spreading public awareness on its route, a Jail Bharo (Court Arrest) agitation will be held at Ram Leela Ground in Delhi. Schedule of the foot march and date of Jail Bharo (Court Arrest) agitation will be finalised at a meeting to be held at Sevagram on March 9, 2015.
A general appeal is being made to people to organise Jail Bharo (Court Arrest) agitations at every village, Taluka, District and state to coincide with the Jail Bharo (Court Arrest) agitation at Delhi. These agitations must be totally non-violent and peaceful.
Farmers, farmer’s organizations and people must view this agitation as the second freedom struggle and participate in it in large numbers. Volunteers from farmer’s organizations, NGOs and youth clubs would be needed to ensure discipline during the foot march and look after arrangements for lunch and night camping of the protestors participating in the foot march. Besides, volunteers would be required to coordinate with the organizations all over the country by phone, email and correspondence while the foot march is on. Volunteers having knowledge of Information Technology will be required to assist during the entire three months period while the foot march goes on. Trucks will be needed to transport beddings and other belongings of the protestors participating in the foot march. All those who can prove of any help are requested to cooperate and help.
Thanking You.

Yours,

K. B. alias Anna Hazare

Those interested in volunteering help should contact on the following address:
Bhrashtachar Virodhi Jana Andolan Nyas

A/P Ralegan Siddhi, Tahsil- Parner,

District- Ahmednagar. Maharashtra
PIN – 414302, Telephone – 02488-240401


Thursday, 5 February 2015

Land Acquisition Act 2013

What is the Central Government’s Ordinance on Land Acquisition Act 2013?

During the campaign for the general elections of Loksabha, the present ruling party has promised the people that they will bring “achchhe din” (better times) for the country. It’s a fact that farmers suicide still continue to take place. It is unfortunate that even after 68 long years of Independence, farmers have to commit suicides out of adverse financial situations. The ordinance brought by the Central Government to amend the Land Acquisition 2013 will worsen the situation further. It may be remembered that the present Land Acquisition Act (2013) has been brought after 118 long years when the incidences of violence occurred in places like Singur, Maan, etc out of protest of farmers for the land acquisition. It transpires clearly that incidence of such violence shall re-occur because of the new amendments brought by an ordinance.

It was expected that the new government will act pro-farmers and provide them some relief. However, this ordinance adequately clarifies that this government is an anti-farmer government and it wants to promote crony capitalism at the cost of farmers and their land.

In the The Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act 2013 (referred as LARR Act for short), there was a provision to seek a prior consent of at least 70 per cent people of the local area before acquiring land for projects. This ordinance has terminated this procedure which means that the government will now be able to acquire any land at its will and whims. This is completely against the democratic procedures.


Also, the LARR Act was equipped with provision to conduct a public hearing as a part of Social Impact Assessment (SIA) before acquiring the land deciding on any project. This provision has been quashed now. Now since no SIA is required, there is no question of any public hearing. Democracy is all about discussions and deliberations which this government is denying. This will deprive the far4mers from their lawful rights.

The LARR act provided that in case a land acquired for a specific purpose remains unused for a period of five years, the land should be transferred back to the original farmer forthwith. However, the new ordinance has diluted this provision to an unacceptable and illogical extent.
The said Act has offered some special concessions to the projects which are in national interest and in public interest. Now through this ordinance, private hospitals and private schools are also included in the list of such projects. Private hospitals charge exorbitant fees not affordable to a common man and the private schools are also very costly for a common man. The government must clarify as to why it wants the private hospitals and private schools to get this undue advantage and favor?

In view of the food security of the country, the LARR Act had a provision that the fertile land having the potential of two or more crops in a year should not be acquired. This provision has been quashed now. Our food security relies on the crop production which we take from fertile lands. The sufficient food cannot be availed without fertile lands. Now through this ordinance, even the irrigated lands can be acquired easily by the capitalists. It is obvious that the government wishes to bring achchhe din only to a few capitalists and not to the farmers.

Gram sabhas are equally important to Loksabha and Vidhan sabhas. Gram sabha elects the representatives of Loksabha and Legislative assembly. So it is obvious that Gram sabha is the mother of Loksabha and Legislative assembly.  Gram Sabha is sovereign. It is not elected but it elects the members of Loksabha (House of people) and legislative assembly. The resources such as water, land and forest; belonging to a village are supposed to be the assets of Gram sabha and therefore central government cannot decide its disposal without consulting the Gram Sabha.    

Since 1857 to 1947, for around 90 long years, thousands of the martyrs have sacrificed their life for freedom. They were dreaming that exit of the British and Home Rule will bring a substantial change to make India a democratic nation. The British left India in 1947 but the country is yet to get the real democracy. The question is whether we will let their sacrifice go in vain or we are ready to sacrifice to establish the democratic means of governance. Let us rise and be ready for any sacrifice which our country demands at this point of time.

Jay Hind!

Yours,


K. B. Alias Anna Hazare

भूमि अधिग्रहण कानून किसके हित में है?


भूमी अधिग्रहण कायद्यामुळे कोणाचे भले होणार?

काय आहे सरकारचा भूमी अधिग्रहण कायद्याखालील वटहूकुम?

निवडणुकीत “अच्छे दिन लायेंगे” अशी हमी देऊन या सरकारने शेतकऱ्यांची मते घेतली. स्वातंत्र्यानंतरच्या ६८ वर्षांनंतरही शेतकऱ्यांच्या आत्महत्त्या होतात ही दुर्दैवी बाब आहे. भूमी अधिग्रहण कायदा (२०१३) मध्ये बदल करण्यासाठी केंद्र सरकारने आणलेल्या नव्या वटहूकुमामुळे शेतकऱ्यांच्या आत्महत्यांमध्ये वाढ होण्याची शक्यता नाकारता येत नाही. दुसर्या बाजूला भू संपादना विरोधात शेतकऱ्यांनी केलेल्या आंदोलनांना सिंगूर, माण आदी ठिकाणी हिंसक वळण लागल्यामुळेच तत्कालीन सरकारला नवा कायदा आणावा लागला होता. या वटहुकुमामुळे पुन्हा एकदा आंदोलने हिंसक होतील अशी भीती वाटते.  
केंद्रात नवीन सरकार सत्तेत आल्यानंतर शेतकऱ्यांच्या हिताचे कायदे होतील अशी अपेक्षा होती; मात्र या सरकारने भूमी अधिग्रहण वटहुकूम आणून शेतकरी विरोधी पाउल उचलले आहे. ही दुर्दैवी बाब आहे.
या सरकारने शेतजमिनींना तथाकथित विकासवाद्यांचे लक्ष्य आणि भक्ष्य करण्याचे धोरण अवलंबून शेतकऱ्यांची घोर फसवणूक केली असल्याचे चित्र स्पष्टपणे दिसत आहे. लोकशाहीचा अर्थ लोकांनी, लोकांसाठी, लोकांकडून चालवलेले राज्य असा आहे, लोकांना फसवून चालवलेले राज्य असा नाही.
भूमी अधिग्रहण कायदा २०१३ मध्ये अशी तरतूद होती गावातील जमीन अधिग्रहित करतांना ७० टक्के शेतकऱ्यांची  संमती आवश्यक असेल. तरच जमीन सरकारला घेता येईल.  मात्र या सरकारने वटहुकूम काढून ती तरतूद काढून टाकली. म्हणजेच सरकार आपल्या मर्जीप्रमाणे शेतकऱ्यांच्या जमिनी आपल्या ताब्यात घेऊ शकेल आणि आपल्या मर्जीप्रमाणे उद्योग क्षेत्रातील लोकांना देऊ शकेल, हे धोरण लोकशाही विरोधी आहे.


मूळ कायद्यात सामाजिक परिणाम मुल्यांकना अंतर्गत ज्या जागी प्रकल्प उभा राहणार आहे तेथील लोकांची लोकशाही पद्धतीने लोक-सुनावणी होऊन लोक तयार असतील तरच जमिनी घ्याव्यात अशी तरतूद होती पण या सरकारने वटहुकूम आणून ती काढून टाकली आहे. हा निर्णय देखील लोकशाहीच्या संपूर्ण विरोधातील निर्णय आहे आणि शेतकऱ्यांवर अन्याय करणारा आहे.
प्रकल्पासाठी अधिगृहित केलेली जमीन पाच वर्षे त्या प्रकल्पासाठी वापरली गेली नाही तर ती जमीन मूळ शेतकऱ्यास परत देण्यात येईल अशी तरतूद होती. ती ही या वटहुकुमाद्वारे काढून घेण्यात आली आहे. आता सदर जमीन मूळ शेतकऱ्याला परत न देता उद्योगपती सरकारच्या मदतीने आपल्या ताब्यात ठेऊ शकतात.
या कायद्यामध्ये ज्या ठिकाणी खरेखुरे राष्ट्रहित साधले जाते त्यातील काही प्रकल्पांना विशेष सवलत देण्यात आली होती. मात्र आता या वटहुकूमाद्वारे खाजगी हॉस्पिटल्स, खाजगी शिक्षण संस्थांच्या शाळा यांनाही “लोक हिताच्या” यादीत समाविष्ट करण्यात आले आहे, जेणे करून आपल्या कार्यकर्त्यांची सोय व्हावी. शेतकऱ्यांच्या जमिनी जबरदस्तीने घ्यायच्या आणि त्या आपल्या कार्यकर्त्यांना हॉस्पिटल्स, शाळा काढण्यासाठी द्यायच्या यात काय लोकहित आहे ते सरकारने सांगावे.
देशात पुरेसे अन्नधान्य उत्पादन होणे आवश्यक असल्याने शेतीच्या दृष्टीने सुपीक असलेल्या जमिनी सरकारने घेऊ नयेत या भूमिकेतून २०१३ च्या कायद्यात अशी तरतूद करण्यात आली होती की “ज्या जमिनीत दोन किंवा त्याहून जास्त पिके घेतली जाऊ शकतात त्या जमिनी उद्योगांना देऊ नयेत”. आता ही तरतूद वटहुकुमाद्वारे काढून टाकण्यात आली आहे. त्यामुळे अगदी बागायती जमिनी सुद्धा उद्योगपती घेऊ शकतात. यांसारखे शेतकऱ्यांसाठी जाचक अशा अनेक तरतुदी करण्यात आल्या आहेत. त्यामुळे फक्त धनाढ्य लोकांसाठीच अच्छे दिन येणार असून शेतकऱ्यांच्या आत्महत्त्यांमध्ये वाढच होणार आहे.
सरकार असे वटहुकूम काढून शेतकऱ्यांवर अन्याय करणार असेल तर इंग्रजांच्या हुकुमशाहीत आणि अशा सरकारमध्ये फरक काय?
लोकसभा, विधानसभा यांच्याइतकेच ग्रामसभांचे स्थान सर्वोच्च आहे. कारण आमदार आणि खासदार ग्रामसभेने निवडून पाठवले म्हणून झाल्या विधानसभा आणि लोकसभा! म्हणजे विधानसभा आणि लोकसभा यांची जननी आहे ग्रामसभा.
ग्रामसभा स्वतंत्र आणि सार्वभौम आहे. १८ वर्षे वय झाले की प्रत्येक माणूस ग्रामसभा सदस्य किंवा वॉर्ड सभा सदस्य होतो आणि एकदा सदस्य झाला की मरेपर्यंत सदस्य असतो. ग्रामसभेला निवडणूक नाही. मात्र ग्रामसभा प्रत्येक पाच वर्षांनी विधानसभा आणि लोकसभेला बदलत असते. ती स्वत: कधीच बदलत नाही. म्हणून राज्य सरकार किंवा केंद्र सरकारला कोणत्याही गावातील जल-जमीन-जंगल यांसारख्या कोणत्याही बाबी घ्यायच्या असतील तर जोपर्यंत ग्रामसभेची मान्यता मिळत नाही तोपर्यंत घेता येत नाहीत असा कायदा करणे आवश्यक होते मात्र या सरकारने ग्रामसभेचा अधिकारच काढून घेऊन लोकशाहीचा गळा घोटला आहे.
प्रश्न उभा राहतो की १८५७ ते १९४७ या नव्वद वर्षांत ज्या लाखो लोकांनी बलिदान केले, हसतहसत फासावर गेले त्यांचे स्वप्न होते की इंग्रज देशातून जावा आणि या देशात लोकशाही यावी. इंग्रज या देशातून गेला पण लोकशाही या देशात आली नाही. काय ते बलिदान व्यर्थ गेले? प्रश्नच आहे.
म्हणून आम्हा भारतीयांना विचार करणे आवश्यक आहे की पुन्हा एकदा आम्हाला बलिदान करावे लागले तरी हरकत नाही मात्र आम्ही ते बलिदान व्यर्थ जाऊ देणार नाही.

जयहिंद !    
भवदीय,

कि. बा. तथा अण्णा हजारे