Monday, 4 December 2017

किसानों की समस्या निवारण हेतु प्रधानमंत्री मोदीजी को चिट्ठी...

1 December 2017

प्रति,
मा. नरेंद्र मोदीजी,
प्रधानमंत्री, भारत सरकार,
राईसीना हिल, नई दिल्ली.

विषय -  देश के किसानों को न्याय मिले इसलिए स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट पर अमल हो, खेती पर निर्भर 60 साल उम्र के किसानों को पेन्शन मिले और खेती उपज को पैदावारी के खर्चे पर आधारित दाम मिले इसलिए दिल्ली में सत्याग्रह करने हेतु...

आपकी सरकार किसानों के भलाई के लिए ना कुछ बोलती है ना कुछ करती है। आपकी सरकार तीन साल में जितनी फिक्र उद्योगपतियों के बारे में करते दिखाई दे रहें हैं, उतनी फिक्र किसानों के बारें में करते नहीं दिखाई दे रहें हैं। आश्चर्य की बात हैं कि, आपकी सरकारने वित्त विधेयक 2017 को धन विधेयक के रुप में पेश करके राजनैतिक दलों को उद्योगपतियों द्वारा दिए जानेवाले चंदे की 7.5 प्रतिशत सीमा हटाई हैं। और कम्पनी जितना चाहे उतना दान राजनैतिक दल को दे सकती है, ऐसा प्रावधान वित्त विधेयक में किया हैं। एसा निर्णय लेने सें लोकतंत्र नही बल्कि पार्टीतंत्र मजबूत होगा। वास्तविक रूप से अगर आपको गरीब किसान की चिन्ता होती तो आप इस धन विधेयक के संशोधन में यह प्रावधान करते कि, कंपनियाँ जितना चाहे उतना दान राजनैतिक पार्टी को नहीं बल्कि गरीब किसानों के लिए दे सकती है। अगर ऐसा होता तो लोकतंत्र मजबूत हो कर किसान और गरिबों को न्याय मिल जाता। सरकार के पास गरीबों और किसानों के प्रति संवेदनशिलता नहीं है यह स्पष्ट होता है।
            कृषिप्रधान भारत देश में 1995 से आज तक 22 साल में 12 लाख किसानों ने आत्महत्या की हैं। लेकिन आपकी सरकार को इससे कोई दर्द नहीं होता, ना किसानों के बारे में संवेदनशिलता दिखाई देती। किसानों के प्रति संवेदनशिलता होती तो आप किसानों की आत्महत्या रोखने के लिए कोशिश करते। आप कहते है कि, मै देश का प्रधानसेवक हूँ। इससे आपके कथनी और करनी में विसंगती दिखाई देती है। अगर आप सच में प्रधानसेवक होते तो, कृषिप्रधान भारत देश में किसानों की यह हालत नहीं होती।
            आपकी सरकार में बडें बडें कृषि शास्त्रज्ञ और तंत्रज्ञ होते हुए भी आपको किसानों के खेती पैदावारी में राज्यनिहाय कौनसे फसल पर कितना खर्चा होता है? यह हिसाब करना असंभव नहीं है। खेती पैदावारी पर जो खर्चा होता है उस पर किसानों को 50 प्रतिशत दाम बढाकर मिला तो किसान आत्महत्या नहीं करेगा। इन बातों का सच खोजने के लिए स्वामिनाथन आयोग जैसे कई आयोग अलग अलग सरकारने बनाए। उन आयोगोंने अपनी रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी है।  लेकिन अभी तक उन रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं हुई है। या उस रिपोर्ट पर सरकार ने क्या किया है यह भी जनता को कभी नही बताया गया ।
            प्रश्न खड़ा होता है कि, आयोग की नियुक्ती और उस आयोग की रिपोर्ट आने तक बड़े पैमाने पर जो खर्चा होता है वह जनता का पैसा है। जब जनता का पैसा खर्च किया तो सरकारने उसपर अमल करना चाहिए। 1950 में बैंक रेग्युलेशन ऐक्ट बना और उसमें कहा है कि, किसानों को कृषी कर्जा देते समय कृषि कर्जा पर चक्रवृद्धि ब्याज नहीं लगाना। सर्वोच्च न्यायालय ने भी किसानों के कृषि कर्जा पर चक्रवृद्धि ब्याज लगाना गैर कानूनी बताया है। आज तक कृषि कर्जा का अधिकांश बैंकोने उल्लंघन किया है। लेकिन उसपर ना रिजर्व बैंक कार्रवाई करती है, ना सरकार का अर्थ विभाग कार्रवाई करता है।
            वास्तव में रिजर्व बैंक ने इस विषय पर गंभिरतापूर्वक ध्यान देना जरूरी था। लेकिन नहीं दिया गया। कृषि कर्जा पर रिजर्व बैंक ने ब्याज दर निश्चित करना जरूरी है। आज कृषि कर्जापर अलग अलग राज्यो में अलग अलग बैंक अपने अपने तरीके से ब्याज लगाती है। और हर तीन माह, छह माह में मुद्दलों में ब्याज मिलाकर चक्रवृद्धि ब्याज लगाने के कारण साहुकार जितना ब्याज नहीं लगाता उससे ज्यादा ब्याज बैंक लगाती है। लेकिन रिजर्व बैंक ऐसे बैंको की ना जाँच करती ना उसपर कार्रवाई करती। इसलिए चक्रवृद्धि ब्याज के कारण 22 से 24 प्रतिशत तक ब्याज लगने से किसान कर्जा नहीं चुका पाता। एक तो खेती पैदावारी में होने वाले खर्चेपर आधारित दाम नहीं मिलते और उपर से चक्रवृद्धि ब्याज के कारण कर्जा चुका नहीं सकता। इस कारण किसान आत्महत्या करता है।
            हमारा ऐसा मानना है कि, किसानों के आत्महत्या के लिए रिजर्व बैंक और सरकार ही जिम्मेदार है। बैंक चक्रवृद्धि ब्याज नहीं लगाती और सरकार खर्चेपर आधारित खेती माल को दाम देती तो किसान आत्महत्या नहीं करता। एक तरफ उद्योगपतियों को करोडो रुपया कर्जा माफ किया जाता है। और कृषि प्रधान भारत देश में किसानों पर अन्याय करनेवाली निति का अवलंब किया जाता है। यह ठिक नहीं है। जब उद्योगपतियोंका कर्जा माफ करते है तब किसानों का कर्जा माफ करना दोष नहीं है। वास्तव में कृषि उपज कर्जा पर चक्रवृद्धि ब्याज लगाना अपराध घोषित करनेवाला सशक्त कानून बनाना जरूरी है। 1972 से 2017 तक जिन किसानों ने चक्रवृद्धि ब्याज जिन जिन बैंको में भरा है, उसकी जाँच रिझर्व बैंकने करके जिन बैंको ने चक्रवृद्धि ब्याज वसूल करके किसानों पर अन्याय किया वह ज्यादा वसुला हुआ पैसा किसानों को वापस करना चाहिए ।
            सरकार औद्योगिक और कई क्षेत्र में निवेश बढ़ाती रहती है, लेकिन कृषि प्रधान भारत देश में कृषि क्षेत्र पर जितना निवेश बढ़ाना चाहिए उतना नहीं बढाती। इसलिए कृषि क्षेत्र का विकास जितना होना चाहिए उतना नहीं होता है। यह कृषि क्षेत्रपर अन्याय होता है । किसान खेती पैदावारी बढ़ाने के लिए और पानी की बचत करने के लिए ड्रिप सिस्टम, स्प्रिंकलर सिस्टम जैसे खेती के लिए आवश्यक वस्तुओं पर 18% GST लगाया जाता है । कृषि पैदावारी के साधन पर GST टैक्स नहीं लगाना चाहिए। सरकार केंद्र की हो अथवा राज्य की उस सरकारने औद्योगिक क्षेत्र के लिए किसानों की जमीन लेते समय किसानों को बिना पुछे उनकी जमिन नहीं लेनी चाहिए। साथ साथ औद्योगिक क्षेत्र के लिए जमिन लेते समय मालिक, किसान है उनकी अनुमती लेना जरुरी है और साथ साथ  ग्रामसभा की अनुमती होना जरूरी है। अगर एसाहि चलता रहा तो अंग्रेज की तानाशाही और आपकी सरकार इनमें फरक नही रहेगा और लोकतंत्र ही खत्रे में आयेगा ।
            किसानों की जमीन के सर्वे कर के ग्रेड बनाना जरूरी था। लेकिन आजादी के 70 साल के बाद भी देश के जमीन का सर्वे नहीं हुआ। ग्रेड निश्चित कर के कौनसी ग्रेड की जमीन प्रकल्प के लिए ली जायेगी यह निश्चित करना जरूरी है। जो किसान अपने खेती पर निर्भर है और उनके परिवार में दुसरी कोई आर्थिक स्त्रोत नहीं है, ऐसे किसानों को कम से कम प्रतिमाह 5 हजार रुपया पेन्शन मिलना जरूरी है। सरकार संसद में बैठे सांसद को 50 हजार तनखा देती है। फिर भी सांसद एक लाख रुपया तनखा की मांग करते है। लेकिन जिन किसान ने अपना जीवन भूमाता की सेवा करते करते, देश कि जनता को अन्नदाता बनकर जीवनभर अन्न-धान्य की उपज की आपूर्ति करता है तो उनको पेन्शन देना गैर नहीं है। जिन किसानों की जमिन ली गई है और उस जमिन पर 5 साल में प्रकल्प खडा नहीं किया ऐसी जमिन किसानों को वापस देनी चाहिए। हमारे देश में समाज और देश के भलाई के बजाए वोटबैंक की सोच ज्यादा होती है । इसलिए जरुरत ना होते हुए कुछ कृषि पैदावारी को आयात करते है और किसान खतरे में आता है। ज्यादा सें ज्यादा  निर्यात होना जरुरत है वह नही होता  इस कारण भी किसान मुसिबत में आता है। एक बात तो स्पष्ट है की, आप मन की बात करते हैं लेकिन किसान, जमिन, पानी के साथ वॉटरशेड डेव्हलोपमेंन्ट, वॉटर मॅनेजमेंन्ट, अग्रिकल्चर डेव्हलपमेंन्ट और उसको जोडकर डेअरी, पोल्ट्री इनपर कभी बात नही करते। यह देश का दुर्भाग्य हैं। आपने हर सांसद को गांव दत्तक दिया, आपने भी गांव दत्तक लिया । उन गांवो में यह सभी प्रयोग होते तो देश के हर राज्यो में किसानों के लिए क्या करना  चाहिए यह तो समजमें आता। किसानो की समस्या समझ में आती और संसद में चर्चा करके उन समस्या को हल करने का प्रयास होता देश की स्थिती बदल जाती। सासंद आदर्श गांव योजना अपनाने के बाद एक भी सांसद  राळेगणसिद्धी और हिवरे बाजार जैसे गांव नही बना पाए यह दुर्भाग्य है।
            किसानों के प्रश्नपर आपकी सरकार गंभिरता सें निर्णय ले इसलिए मैने शहिद दिवस पर 23 मार्च 2018 को दिल्ली में आंदोलन करने का निर्णय लिया है।
धन्यवाद। जयहिंद।

भवदीय,
कि. बा. तथा अण्णा हजारे

No comments:

Post a comment